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श्रावणी के प्रमुख अंग हैं- प्रायश्चित, संकल्प, संस्कार और स्वाध्याय, जानें- पं. भालचंद्र विनायक की राय
वैदिक विद्वान पं. भालचंद्र विनायक बादल के आचार्यत्व में सम्पन्न इस श्रावणी उपाकर्म में हजारों ऋग्वेदी ब्राह्मणों ने भाग लिया। आचार्य भालचंद्र विनायक बादल ने बताया कि श्रावणी के प्रमुख अंग हैं- प्रायश्चित, संकल्प, संस्कार और स्वाध्याय। यह संस्कार नदी या सरोवर के तट पर व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से किया जाता है। इसमें हेमाद्रि स्नान किया जाता है और बाह्य व अंतःकरण की शुद्धि के लिए पंचगव्य- अर्थात् गौ-दुग्ध, दधि, घृत, गौमूत्र व गोबर- से स्नान व पान किया जाता है। इसके अलावा नदी की रज, भस्म, अपामार्ग, कुशा आदि से वैदिक विधि अनुसार मंत्रोच्चार के मध्य बाह्य शुद्धि हेतु स्नान का विधान है। अपामार्ग प्राचीन काल की एक औषधि है। आचार्य ने बताया कि स्नान के बाद मणिकर्णिका तीर्थ पर स्थित सतुआ बाबा आश्रम में ब्राह्मणजनों द्वारा देव तर्पण, ऋषि तर्पण, पितृ तर्पण, सप्तऋषि पूजन, सूर्योपासना और मां गायत्री का वैदिक मंत्रों से पूजन किया गया। इसके पश्चात वर्षभर पहनने वाले यज्ञोपवीतों का पूजन कर उन्हें अभिमंत्रित किया गया। श्रावणी उपाकर्म श्रावण पूर्णिमा को श्रवण नक्षत्र में ही किया जाता है।
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