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नागरी प्रचारिणी सभा में विद्यार्थियों को दी जा रही साहित्य के विरासत की जानकारी, VIDEO
हिंदी भाषा, साहित्य और भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन में अग्रणी भूमिका निभाने वाली नागरी प्रचारिणी सभा, काशी इन दिनों विद्यार्थियों के लिए ज्ञान और शोध का महत्वपूर्ण केंद्र बनी हुई है। यहां 15 दिवसीय इंटर्नशिप कार्यक्रम का आयोजन किया गया है, जिसमें बीएचयू, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वसन्ता कॉलेज और हरिश्चंद्र कॉलेज के छात्र-छात्राएं भाग लेकर भारतीय साहित्य और उसके गौरवशाली इतिहास की जानकारी प्राप्त कर रहे हैं।
इंटर्नशिप के दौरान विद्यार्थियों को हिंदी साहित्य के विकास, प्रमुख साहित्यकारों के योगदान तथा भारतीय ज्ञान परंपरा से परिचित कराया जा रहा है। सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल विद्यार्थियों के मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हुए उन्हें साहित्यिक धरोहरों, दुर्लभ ग्रंथों और हिंदी भाषा के विकास से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों की जानकारी दे रहे हैं। छात्र-छात्राओं को सभा के पुस्तकालय, पांडुलिपि संग्रह और शोध कार्यों से भी अवगत कराया जा रहा है, जिससे उन्हें भारतीय साहित्य की गहराई और व्यापकता को समझने का अवसर मिल रहा है।
नागरी प्रचारिणी सभा का इतिहास हिंदी साहित्य के विकास से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसकी स्थापना वर्ष 1893 में काशी में हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से की गई थी। उस समय हिंदी को प्रशासन, शिक्षा और साहित्य की प्रमुख भाषा के रूप में स्थापित करने के लिए व्यापक प्रयास किए जा रहे थे। सभा ने हिंदी शब्दकोश निर्माण, पांडुलिपियों के संरक्षण, साहित्यिक शोध और दुर्लभ ग्रंथों के प्रकाशन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। हिंदी के मानकीकरण और देवनागरी लिपि को लोकप्रिय बनाने में भी संस्था की भूमिका ऐतिहासिक रही है।
प्रधानमंत्री ने बताया कि सभा द्वारा तैयार किया गया ‘हिंदी शब्दसागर’ आज भी हिंदी का महत्वपूर्ण शब्दकोश माना जाता है। इसके अलावा अनेक साहित्यकारों की कृतियों के संपादन और प्रकाशन का कार्य भी संस्था ने किया है। यही कारण है कि नागरी प्रचारिणी सभा को हिंदी भाषा और साहित्य के प्रमुख केंद्रों में गिना जाता है।
व्योमेश के अनुसार, इंटर्नशिप में शामिल विद्यार्थी इस पहल को अत्यंत उपयोगी बता रहे हैं। उनका कहना है कि कक्षा की पढ़ाई के साथ-साथ साहित्यिक संस्थाओं के इतिहास और कार्यप्रणाली को जानने का यह अवसर उनके ज्ञान और शोध दृष्टि को समृद्ध करेगा। सभा के पदाधिकारियों ने बताया कि भविष्य में भी युवाओं को भारतीय साहित्य और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने के लिए ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहेंगे।
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