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Mandi: Women of Sarkaghat becoming self-reliant through silkworm rearing; Madhu from Singharan scripts a new success story
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Mandi: रेशम कीट पालन से आत्मनिर्भर बन रही सरकाघाट की महिलाएं, सिंहारन की मधु ने लिखी सफलता की नई इबारत
Ankesh Dogra
Updated Sun, 07 Jun 2026 12:10 PM IST
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मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में प्रदेश सरकार ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए अनेक योजनाएं संचालित कर रही है। इन योजनाओं का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने के साथ-साथ स्वरोजगार के नए अवसर सृजित करना है। इन्हीं प्रयासों के तहत उद्योग विभाग के रेशम विंग द्वारा संचालित रेशम कीट पालन कार्यक्रम ग्रामीण क्षेत्रों, विशेषकर महिलाओं के लिए आर्थिक सशक्तिकरण का प्रभावी माध्यम बनकर उभरा है। मंडी जिला के सरकाघाट क्षेत्र की महिलाएं रेशम कीट पालन अपनाकर आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हैं। सरकाघाट तहसील के सिंहारन गांव की मधु इस योजना की एक प्रेरणादायक मिसाल हैं। मधु बताती हैं कि उनके गांव में रेशम विभाग द्वारा आयोजित एक जागरूकता शिविर के माध्यम से रेशम कीट पालन की जानकारी प्राप्त हुई। विभाग के मार्गदर्शन और सरकारी सहायता से प्रेरित होकर उन्होंने इस व्यवसाय को अपनाया। वे अपने घर पर ही रेशम उत्पादन कर रही हैं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आया है। उत्पादित रेशम का बाजार मूल्य लगभग 1,000 से 1,200 रुपये प्रति किलोग्राम तक मिल रहा है। एक सीजन में उन्हें लगभग 12 हजार रुपये की आय प्राप्त होती है, जबकि वर्ष में दो सीजन के माध्यम से वे औसतन 24 से 25 हजार रुपये तक अर्जित कर रही हैं। मधु बताती हैं कि सरकार द्वारा उन्हें रेशम कीट पालन के लिए आवश्यक उपकरण, जैसे रेयरिंग स्टैंड, प्लास्टिक ट्रे और नेट आदि उपलब्ध करवाए गए हैं। इसके अतिरिक्त रेशम कक्ष भी प्रदान किया गया है, जहां वे व्यवस्थित रूप से उत्पादन कार्य कर रही हैं। सरकार द्वारा शहतूत के पौधे उपलब्ध करवाने के साथ-साथ उनकी रोपाई के लिए आर्थिक सहायता और वर्ष में दो बार रेशम सीड उपलब्ध करवाए जाते हैं। विभागीय अधिकारी समय-समय पर निरीक्षण कर तकनीकी मार्गदर्शन देते हैं।
उनका कहना है कि यह योजना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के साथ-साथ महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में अत्यंत कारगर सिद्ध हो रही है। इस योजना के लिए मधु ने प्रदेश सरकार तथा मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इससे ग्रामीण परिवारों को घर के निकट ही आय का एक स्थायी स्रोत उपलब्ध हुआ है। मधु की सफलता ने क्षेत्र की अन्य महिलाओं को भी इस व्यवसाय को अपनाने के लिए प्रेरित किया है। वर्तमान में क्षेत्र की लगभग 40 से 50 महिलाएं रेशम कीट पालन से जुड़ी हैं। इससे न केवल उनकी आय में वृद्धि हुई, बल्कि महिला सशक्तिकरण को भी नई दिशा मिली है। रेशम कीट पालन के लिए शहतूत के पौधों की रोपाई का पूरा खर्च सरकार वहन करती है। इसके अतिरिक्त उत्पादकों को रेयरिंग स्टैंड, ट्रे, प्लास्टिक नेट्स सहित अन्य आवश्यक उपकरण विभिन्न योजनाओं के तहत उपलब्ध करवाए जाते हैं। बड़े स्तर पर उत्पादन करने के इच्छुक लाभार्थियों को 20×20 फीट का रेशम कक्ष भी प्रदान किया जाता है, जिसका पूरा व्यय सरकार द्वारा उठाया जाता है। योजना में केंद्र एवं राज्य सरकार की ओर से वित्तीय प्रोत्साहन के साथ ही उत्पादक को मात्र 10 प्रतिशत व्यय ही वहन करना होता है। रेशम उत्पादन की प्रक्रिया में ककून तैयार होने में केवल 15 से 18 दिन का समय लगता है, जिससे एक सीजन में 15 से 18 हजार रुपये तक की आय अर्जित की जा सकती है। राजकीय रेशम केंद्र मौंही के रेशम निरीक्षक अरुण कुमार के अनुसार उनके कार्यक्षेत्र में सज्याओ-पीपलू, बलद्वाड़ा तथा समैला क्षेत्र शामिल हैं, जो सेरीकल्चर डिवीजन संधोल के अंतर्गत आते हैं। इस वर्ष क्षेत्र में लगभग 250 लोगों को रेशम सीड आवंटित किए गए हैं और 50 से 55 नए रेशम कक्ष बनाए जा रहे हैं, जिससे इतने ही परिवारों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा। उन्होंने बताया कि वर्ष में दो बार आने वाले सीजन (मार्च एवं अगस्त) के माध्यम से एक उत्पादक सालाना 35 से 50 हजार रुपये तक की आय प्राप्त कर सकता है।
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