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शिवलिंग पर गिरी कुल्हाड़ी तो निकलने लगा खून, आज भी है निशान, वीडियो में जानें खासियत
चंदौली के चकिया विकासखंड के हेतिमपुर गांव में जागेश्वरनाथ मंदिर का जिक्र स्कंदपुराण के काशी खंड में मिलता है। यह कभी महर्षि याज्ञवल्क्य ऋषि की तपस्थली थी। तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने स्वयं दर्शन दिया और स्वयंभू शिविलिंग के रूप में मौजूद हो गए। जहां कई शिवलिंग को लेकर यह मान्यता है कि वह तिल-तिल जौ के आकार से बढ़ते हैं। लेकिन बाबा जागेश्वरनाथ का शिवलिंग अपने वृद्धि का यथार्थ प्रमाण देता है। शिवलिंग प्रतिवर्ष तिल भर बढ़ता है। इसमें उसकी मोटाई से लेकर ऊंचाई तक में बढ़ोतरी होती है। इसकी वजह से अब तक सात अरघे फट चुके हैं। वहीं स्थानीय लोगों ने बताया कि एक बार एक चरवाहे की ल्हाड़ी गिरने से शिवलिंग से रक्त की धार निकली थी। कुल्हाड़ी का निशान आज भी शिवलिंग पर बना हुआ है।
चकिया के शिकारगंज में प्राकृतिक छटाओं से आच्छादित जागेश्वरनाथ अतीत में महर्षि याज्ञवल्क्य की तपोभूमि रही है। जिसका वर्णन काशीखंड में भी मिलता है और स्वयंभू शिवलिंग में इनकी गिनती होती है। मान्यता है कि महर्षि याज्ञवल्क्य की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिया था और यहां शिवलिंग खुद-ब-खुद निकला था। महर्षि याज्ञवल्क्य के प्रभु होने की वजह से इनका सही नाम यागेश्वरनाथ है। लेकिन लोक में य को ज के नाम बोलने से यह अब जागेश्वरनाथ के नाम से जाना जाता है।
तत्कालीन काशी नरेश के संपत्ति सुरक्षा अधिकारी हजारी प्रसाद ने 1600 ई. के करीब मंदिर का निर्माण करवाया था। बाबा जागेश्वर नाथ के दर्शन पूजन को लेकर बिहार प्रांत वाराणसी, सोनभद्र, मिर्जापुर और जौनपुर के शिव भक्त दर्शन पूजन को पहुंचते हैं। मंदिर के महंत अनूप गिरी ने कथा ने बताया कि एक बार चारा काटने के लिए एक चरवाहा नदी के किनारे आया। वर्तमान में जहां शिवलिग है वहां विशाल वटवृक्ष था। उसी वृक्ष पर चढ़कर हाथीवान चारा (पेड़ की पत्तियां आदि) काटने लगा। इसी बीच, कुल्हाड़ी ऊपर से गिर गई और नीचे गोलाकार पत्थर कट गया जिससे रक्त की धार चलने लगी। यह देख वह भाग गया।आसपास बस्ती न होने के बावजूद कुछ दूर बसे गांव के लोग झाड़ी साफ कर पूजा-पाठ करना शुरू कर दिए। धीरे-धीरे उक्त पत्थर शिवलिंग का आकार लेकर विशालकाय होता गया। दशकों बाद दर्जनों गांव के धनाढ्य लोगों ने चंदा लगाकर भव्य मंदिर का निर्माण कराया।
मंदिर के नाम कई किसानों ने जमीन भी दान स्वरूप दी। समीप स्थित रामजानकी मंदिर, मां दुर्गा मंदिर का निर्माण भी भक्तजनों ने कराया। स्थापत्य कला से मंदिर का निर्माण भारतीय धार्मिक स्थापत्य कला के अनुरूप मंदिर के बाहर द्वारपाल के रूप में देव प्रतिमाएं बाहर न होकर अंदर हैं, जबकि देवी पार्वती की मूर्तियां अंदर विराजमान हैं। सावन माह के अलावा वसंत पंचमी और शिवरात्रि में यहां भव्य समारोह आयोजित किए जाते हैं। महंत अनूप गिरी की मानें तो काशीखंड के शिवलिंगों में महर्षि याज्ञवल्क्य की तपस्या से प्रकट हुए स्वयंभू बाबा यागेश्वरनाथ अब के जागेश्वनाथ का वर्णन है। शिवलिंग हर वर्ष जौ भर बढ़ते हैं। इस प्रमाण यह है कि इनके बढ़ने से अब तक सात अरघे टूट चुके हैं। अभी भी जो अरघा है, उस पर भी लकीर आ गई है, लेकिन चांदी से मढ़े जोन से वह दिख नहीं रहा है। सावन और शिवरात्रि में यहां दर्शन-पूजन के लिए लोगों की भारी भीड़ जुटती है।
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