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Despite sustaining gunshot wounds, Lieutenant RP Roparia shot down two terrorists; he was awarded the Ashoka Chakra for supreme bravery.
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गाेलियां लगने के बाद भी लेफ्टिनेंट आरपी रोपड़िया ने दो आंतकियों को मार गिराया, सर्वोच्च बहादुरी के लिए मिला अशोक चक्र
वर्ष 1984 में पंजाब के अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर में ऑपरेशन ब्लू स्टार चल रहा था। चारों ओर से गोलियां बरस रही थी। भिंडरावाला के समर्थक स्वर्ण मंदिर की अलग-अलग मंजिल पर मशीन गन लगा कर पोजीशन संभाले हुए थे। लेफ्टिनेंट आरपी रोपड़िया डी कंपनी से लिंक स्थापित करने के लिए नीचे की मंजिल पर जा रहे थे तो छिपे हुए आतंकियों ने उन पर ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी। गोलियां लगने के बाद भी वह पीछे नहीं हटे। नीचे वाली मंजिल पर पहुंच कर संदेश पहुंचाया। 23 साल की उम्र में लेफ्टिनेंट रामप्रकाश रोपड़िया को इस बहादुरी के लिए अशोक चक्र प्रदान किया गया।
हिसार जिले में अब तक केवल एक ही सैनिक को अशोक चक्र मिला है। आरपी रोपड़िया की भतीजी रेणु ने बताया कि वो 1982 में उनको बारामूला में पोस्टिंग मिली थी। 1983 में उनकी जालंधर में पोस्टिंग हुई थी। उस समय पंजाब में आतंकवाद चल रहा था। जब परिवार के लोग पंजाब के हालात पर पूछते तो हमेशा चिट्ठी में लिखते थे कि चिंता मत करो सब सही है। ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरू हुआ तो उस समय आरपी रोपड़िया छुट्टी पर आए हुए थे। सेना ने उनको बुलाया नहीं तब भी वह खुद से अपनी बटालियन में जाने के लिए निकल गए। उनको हिसार से पंजाब के लिए सीधी बस नहीं मिली। पहले वह किसी बस से अंबाला तक पहुंचे। इसके बाद स्कूटर पर लिफ्ट लेकर कुछ दूरी तक पहुंचे।
कर्फ्यू होने के चलते उनको वहां तक काफी लंबा सफर साइकिल पर भी पूरा किया। अपनी बटालियन पहुंचे तो अधिकारी उनको देख कर मुस्काए। आरपी रोपड़िया भी मुस्कराने लगे। उनको कमांडिंग ऑफिसर को असिस्टेंट करना था।आरपी रोपड़िया को सी कंपनी का कमांडिंग ऑफिसर करना था। सी कंपनी पहले किसी दूसरे अधिकारी के अंडर काम रह रही थी। आरपी रोपड़िया ने पहले कंपनी को बहादुरी का किस्सा सुनाते हुए बहादुरी से आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित किया।
जिसके बाद उनकी पूरी टुकड़ी काफी मोटिवेटेड होकर आगे बढ़ने लगी। मेजर शाह बेग के साथ मिल कर भिंडरेवाला ने पूरे एरिया को युद्ध के मैदान में बदल दिया था। जिसके चलते सैनिकों को आगे बढ़ना काफी चुनौतीपूर्ण हो गया था। सैनिकों को हरमंदिर साहिब की ओर गोली चलाने की अनुमति नहीं थी। इस कारण सबसे अधिक कैजुअल्टी हो रही थी।
5-6 जून की रात को 26 मद्रास रेजिमेंट की 'सी' कंपनी को एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उन्हें आतंकवादियों की मजबूत किलेबंदी वाली इमारत की पहली मंजिल पर कब्जा करना था। यह इमारत भारी किलेबंद थी और अंदर उग्र आतंकवादी मौजूद थे। लेफ्टिनेंट रोपड़िया अपनी कंपनी का नेतृत्व कर रहे थे। उन्होंने अपने सैनिकों के आगे बढ़कर आतंकवादियों पर स्वचालित हथियारों से भारी गोलियां बरसाईं। पहली मंजिल में घुसने की तीन कोशिशें नाकाम रहीं।
आगे बढ़ना बेहद कठिन हो गया था। लेफ्टिनेंट रामप्रकाश रोपड़िया ने नायब सूबेदार जी.जी. कोशी के साथ चौथी बार कोशिश की और कामयाब रहे। उन्होंने बंकरों का सफाया शुरू किया और इमारत की पहली मंजिल को पूरी तरह साफ कर दिया। इसके बाद लेफ्टिनेंट रोपड़िया ने अपनी कंपनी को "डी" कंपनी से जोड़ने का फैसला किया।
सीढ़ियों से रुकावट हटाने के लिए उन्होंने भारी मशीनगन से गोलियां बरसाईं। सैनिकों को दरवाजा खोलने का निर्देश देते ही आतंकवादियों ने उन पर गोलियां चलाईं। लेफ्टिनेंट रोपड़िया ने दो हथगोले फेंके और सीढ़ियों में दाखिल हो गए। उन्होंने एक घायल आतंकवादी को गोली मारकर ढेर किया और अपने गहरे घावों की परवाह न करते हुए डी कंपनी से संपर्क स्थापित किया।
अत्यधिक खून बह जाने के कारण वे नीचे आते ही बेहोश होकर गिर पड़े। उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन उनके घाव घातक सिद्ध हुए। इस कार्रवाई में लेफ्टिनेंट रामप्रकाश रोपड़िया ने असाधारण शौर्य, अदम्य संकल्प और उच्चकोटि की कर्तव्यपरायणता का परिचय दिया। उन्होंने सेना की उच्चतम परंपराओं के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया। 23 मार्च, 1985 को नई दिल्ली में तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने ले.आरपी रोपड़िया के पिता को अशोक चक्र प्रदान किया।
मेरे भाई आरपी रोपड़िया बचपन से ही फौजी बनना चाहते थे। खेल में उनकी काफी रुचि थी। गांव के माढा में उनकी प्राथमिक शिक्षा हुई। पांचवीं में उन्होंने स्कॉलरशिप भी हासिल की। छठी कक्षा के बाद उनका दाखिला सैनिक स्कूल कुंजपूरा में हो गया था। वहां से 12वीं करने के बाद उन्होंने एचएयू में बीएससी एग्रीकल्चर में दाखिला लिया।
बीएससी करने के बाद उन्होंने आईएनए में उनका सेकेंड लेफ्टिनेंट के तौर पर चयन हुआ। फुटबॉल के अच्छे खिलाड़ी थे। स्कूल, कॉलेज तथा यूनिवर्सिटी तक वह फुटबॉल के नेशनल लेवल के खिलाड़ी रहे। जिस समय आरपी रोपड़िया की शहादत हुई उस समय में भी एयरफोर्स में ट्रेनिंग ले रहा था। राजबीर रोपड़िया, सेक्टर 15, हिसार
तीन दोस्तों ने एक साथ जॉइन की थी सेना,42 साल बाद भी निभा रहे
संत कुमार, आरपी रोपड़िया, रविंद्र परमार सैनिक स्कूल कुंजपुरा से ही दोस्त बन गए थे। तीनों का एक साथ सेकेंड लेफ्टिनेंट के तौर पर चयन हुआ था। तीनों ने एक सेना जॉइन की। जिसमें आरपी रोपड़िया को मद्रास रैजीमेंट मिली तो उन्होंने दोस्तों को मस्ती करते हुए चिढ़ाया। उन्होंने कहा था कि मैं तो मद्रास में रह कर पूरा दक्षिण भारत देखूंगा। आप लोग यहां पर ही रह जाओगे। करीब 42 साल बाद भी संत कुमार तथा रविंद्र परमार का परिवार रोपड़िया परिवार से अपना दोस्ती का संबंध निभा रहा है।
गांव के स्कूल का नाम लेफ्टिनेंट आरपी रोपड़िया के नाम रखा..
गांव पाली निवासी मास्टर भाल सिंह के तीन बेटे तथा दो बेटियां थीं। सबसे बड़ी बहन विद्या देवी, राजेंद्र प्रसाद, कृष्णा देवी, रामप्रकाश, किताबो देवी तथा सबसे छोटे राजबीर सिंह थे। छह भाई-बहन में राजेंद्र प्रसाद का देहांत हो चुका है। रामप्रकाश की शहादत हुई थी। अब तीन बहन तथा सबसे छोटे भाई राजबीर सिंह अभी जीवित हैं। राजबीर सिंह ने बताया कि गांव में रामप्रकाश रोपड़िया के नाम पर गांव के राजकीय स्कूल का नाम रखा गया है। मद्रास रेजीमेंट में आरपी रोपड़िया के नाम से हॉल बनाया गया है। हिसार आर्मी कैंट के गेट पर भी उनकी प्रतिमा लगाई जाने की प्रक्रिया चल रही है। शहादत के 42 साल बाद भी मद्रास रेजीमेंट समय-समय पर आरपी रोपड़िया के परिवार को बुला कर सम्मानित करते हैं।
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