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झज्जर : खडकसैन की खटका नगरी से बदलकर बादली तक पहुंचा है गांव का नामकरण
मेरा गांव मेरी शान
मनोज कौशिक
बादली। दिल्ली और गुरूग्राम जैसे शहरों के बीच में बसा झज्जर जिले का गांव बादली गांव अपनी वीरता, बदलते स्वरूप और एतिहासिक इतिहास के लिए जाना जाता है। गांव बादली एक या दो बार नहीं बल्कि 10 बार उजड़कर बसा है जो कि बादली की संघर्ष की कहानी बयां कर रहा है।
बादली को बदरसेन नाम के राजपूत ने बसाया था। जिनकी बाद में इरान के सैय्यद मुसलमानों ने आक्रमण कर हत्या कर दी थी। लड़ाई मे सैय्यद भी मारे गये थे जिससे बादली विरान हो गया। बताया गया है कि विरान बादली को रोर जाति ने दौबारा बसा दिया था। रोर जाति के आबाद होने के कुछ समय बाद कुछ लोग यहां आए और वो गुलिया जाट बन गए जबकि रोर जाति को उत्तर दिशा की ओर भगा दिया। नौंवी शताब्दी में कोयलपुर खेतावास से गुलिया खाप के कुछ पूर्वज यहां आकर बसे थे। गांव ने प्राकृतिक आपदाओं, मुगलों के आक्रमण झेले है। आपदाओं व आक्रमणों के कारण बादली 10 बार उजड़कर बार-बार बसता रहा है। जिसे “दादीबादली” के नाम से भी जाना जाता है।
एक परिचय:
गांव की कुल आबादी 17 हजार से उपर है और मतदाताओं की संख्या 10 हजार 532 है जिनमें 5566 पुरूष और 4966 महिलाएं हैं। पुराने समय से ही गांव चार पाना में विभाजित है जिसमें चौधराण, लाख्याण, मिंघाण और चूड़ाण हैं। चौधराण सबसे अहम और बड़ा पाना है। गांव में सभी जातियों के लाेग रहते हैं।
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