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चेहल्लुम-ए-शोहदाए कर्बला का मरकजी जुलूस, बड़ी संख्या में अजादारों ने की शिरकत
सुभाष गुप्ता
Updated Thu, 06 Aug 2026 05:03 PM IST
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अंजुमन तंजीम-ए-हुसैनी के तत्वावधान में चेहल्लुम-ए-शोहदाए कर्बला और अरबईन-ए-हुसैनीؑ के मौके पर जुलूस-ए-अजा निकाला गया। जुलूस में बड़ी संख्या में अजादारों, ज़ायरीनों और अकीदतमंदों ने शिरकत की। जुलूस से पहले चौक स्थित वक्फ इमामबाड़ा तस्कीन-ए-जैनबؑ में मजलिस-ए-अजा आयोजित हुई, जिसमें उलमा व जाकिरीन ने वाकिया-ए-कर्बला, शहादत-ए-इमाम हुसैन और शोहदाए कर्बला की अजीम कुर्बानियों पर विस्तार से रोशनी डाली।
इब्तिदाई मजलिस को खिताब करते हुए मौलाना मासूम असगर मारूफी ने कहा कि कर्बला सिर्फ तारीख का एक वाकिया नहीं, बल्कि हक और बातिल के बीच फर्क स्पष्ट करने वाला अजीम सबक है। इमाम हुसैन ने अपने नाना हजरत रसूल-ए-अकरम के दीन की सरबुलंदी, अदल-ओ-इंसाफ और इंसानी कद्रों की हिफाजत के लिए अजीम कुर्बानी पेश की। मजलिस के बाद शबीहे ज़ुलजनाह, ताबूत, अलम-ए-मुबारक और ताजिया के साथ जुलूस-ए-अजा बरामद हुआ। अजादार नौहाख्वानी और सीना-जनी करते हुए इमाम हुसैन और शोहदा-ए-कर्बला को खिराज-ए-अकीदत पेश करते रहे। जुलूस के रास्ते में कई जगह अजादारों और जायरीनों के लिए सबील, लंगर और दूसरी खिदमात का भी इंतजाम किया गया। रौजा अली आशिकान के पास तकरीर करते हुए हुए मौलाना कौसर रजा नकवी ने कहा कि इमाम हुसैन और उनके वफादार असहाब ने तादाद में कम होने के बावजूद ज़ुल्म व जब्र के सामने सर नहीं झुकाया। कर्बला हमें यह सबक देती है कि मुश्किल हालात में भी हक का साथ नहीं छोड़ना चाहिए और ज़ुल्म व नाइंसाफी के खिलाफ आवाज़ बुलंद करनी चाहिए। जुलूस अपने कदीम रास्तों से होता हुआ मेन रोड पर पहुंचा तो लब्बैक या हुसैन के गगनभेदी नारों से पूरा इलाका गूंज उठा। मेन रोड पर खिताब करते हुए मौलाना शारिब अब्बास ने हजरत ज़ैनब कुबरा की अजीम कुर्बानियों और किरदार पर रोशनी डाली। जुलूस के आखिर में शोहदा-ए-कर्बला के 72 शहीदों के शबीहे ताबूत की जियारत कराई गई। जुलूस की निजामत सागर आजमी और मोहम्मद हुसैन ने अंजाम दी। आखिर में अंजुमन तंजीम-ए-हुसैनी के जिम्मेदारान ने जुलूस में शामिल तमाम अजादारों, ज़ायरीनों, अकीदतमंदों और सहयोग करने वाले सभी का शुक्रिया अदा किया।
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