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बाराबंकी में भगवान श्रीराम के गुरुकुल को कॉरिडोर के रूप में विकसित करने की मांग
बाराबंकी में जिला मुख्यालय से लगभग सात किलोमीटर दक्षिण दिशा में स्थित नगर पंचायत सतरिख, जिसे सप्तऋषि आश्रम के नाम से भी जाना जाता है, भगवान श्रीराम के प्राचीन गुरुकुल के रूप में विकसित होने की क्षमता रखता है। मान्यता है कि इसी आश्रम में भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न ने शिक्षा प्राप्त की थी। अयोध्या में रामलला के भव्य मंदिर की स्थापना के बाद, इस ऐतिहासिक स्थल को विकसित करने की ओर प्रशासनिक और सार्वजनिक ध्यान आकर्षित हुआ है।
सप्तऋषि आश्रम की पहचान और विकास की चुनौतियां---
सतरिख में सप्तऋषि आश्रम के अस्तित्व को लेकर कई दावेदार हैं। डेढ़ साल पहले तत्कालीन जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार ने प्राचीन उदासीन अखाड़ा आश्रम के संत नानक शरण दास से भेंट की थी, जिन्होंने अपने आश्रम को सप्तऋषि आश्रम बताया। इसके अतिरिक्त, हरवंश औषधालय परिसर, प्राचीन देवघरा माता मंदिर और श्रीराम चंद्र मिशन के आश्रम भी स्वयं को सप्तऋषि आश्रम के रूप में प्रमाणित करने के अपने तर्क प्रस्तुत करते हैं। इस पहचान की दुविधा के कारण, वंदन योजना के तहत सप्तऋषि आश्रम के जीर्णोद्धार का प्रयास विफल रहा। हालांकि, यह पाया गया कि उदासीन अखाड़ा सहित अन्य सभी कथित सप्तऋषि आश्रम स्थल नगर पंचायत सतरिख की सीमा से बाहर स्थित हैं। इस कारण, ''वंदन योजना'' के तहत विकास का प्रस्ताव नगर पंचायत सतरिख द्वारा शासन को नहीं भेजा जा सका।
अब, इस पूरे क्षेत्र को ''श्रीराम गुरुकुल कॉरिडोर'' के रूप में विकसित करने का विचार जोर पकड़ रहा है। इस परिकल्पना के तहत, सभी प्रमुख धार्मिक स्थलों का जीर्णोद्धार करने और सरकार द्वारा सप्तऋषि आश्रम क्षेत्र को अधिग्रहित करने के संबंध में जिले के साहित्यकार अजय सिंह गुरु ने शासन से मांग की है। इन्होंने अधिग्रहण के लिए उपयुक्त क्षेत्र का सर्वेक्षण भी किया है। अजय सिंह गुरु, जो पूर्व में भी ऐसे ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं, के अनुसार सतरिख थाने से दक्षिण-पश्चिम का कोना सप्तऋषि आश्रम का मुख्य क्षेत्र माना जा सकता है।
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