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Mandi Chham dance is the centre of attraction in Chheschu fair, after all Buddhist followers dance wearing masks
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Mandi: छेश्चू मेले में छम नृत्य आकर्षण का केंद्र, आखिर मुखौटे पहनकर नाचते हैं बौद्ध अनुयायी
तीन धर्मों की संगम स्थली के नाम से विख्यात रिवालसर शहर में इन दिनों तीन दिवसीय राज्य स्तरीय छेश्चू मेले का आयोजन किया जा रहा है। इन दिनों बौद्ध अनुयायियों का तांता लगा हुआ है। ये सभी लोग यहां गुरू पद्मसंभव के जन्मदिन को मनाने यहां आए हुए हैं। बौद्ध धर्म में रिवालसर को गुरू पद्मसंभव की जन्मभूमि माना गया है। बताया जाता है कि 8वीं शताब्दी में वे यहीं पर अवतरित हुए थे। यही कारण है कि उनके जन्मदिन पर यहां छेश्चू मेला मनाया जाता है। इस मेले के दौरान सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र रहता है छम नृत्य। बौद्ध अनुयायी देवताओं, राक्षसों और कंकालों के रंगीन मुखौटे पहनकर और अलग-अलग रूप धारण करके एक गोलाकार घेरे में इस नृत्य को प्रस्तुत करते हैं। न्यिंगमापा बौद्ध मंदिर समिति रिवालसर के उपाध्यक्ष लेख राम नेगी और बौद्ध भीक्षु फ्रबु तेंजिन ने बताया कि छम नृत्य के माध्यम से गुरू पद्मसंभव के 8 रूपों का प्रदर्शन किया जाता है। इसके माध्यम से बूरी शक्तियों को भगाने, सकारात्मक उर्जा को बढ़ाने और मृत्यु उपरांत आत्मा को सद्मार्ग पर चलने के प्रति प्रेरित करने का संदेश दिया जाता है। रिवालसर को गुरू पद्मसंभव की जन्मभूमि माना गया है इसलिए छेश्चू मेला बौद्ध अनुयायियों के लिए एक तीर्थ है। यही कारण है कि हर वर्ष इस मेले में न सिर्फ देश भर से बल्कि विदेशों से भी बड़ी संख्या में बौद्ध अनुयायी यहां आकर इसका हिस्सा बनते हैं। लाहुल स्पिति से आए बौद्ध अनुयायी मंगल सिंह खाम्पा ने बताया कि रिवालसर स्थित बौद्ध मंदिर में गुरू पद्संभव आज भी जागृत रूप में विराजमान हैं। इसलिए यहां आना हर बार एक नई उर्जा मिलने जैसा होता है। बौद्ध अनुयायी इस दौरान लगातार मंत्र जाप और दीए जलाकर अराधना करते हुए नजर आते हैं। एसडीएम बल्ह स्मृतिका नेगी ने बताया कि तीन दिवसीय राज्य स्तरीय छेश्चू मेले को हर वर्ष प्रशासन द्वारा आयोजित किया जाता है। क्योंकि यह तीन धर्मों की संगम स्थली है इसलिए तीनों धर्मों के लोगों की बराबर सहभागिता निभाते हुए इसका आयोजन किया जाता है। उन्होंने बताया कि धीरे-धीरे मेले का स्वरूप बढ़ता जा रहा है। गत वर्ष से संगम आरती की शुरूआत हुई है जिसमें सभी धर्मों के लोग रिवालसर झील के तट पर आरती करते हैं। प्रशासन की तरफ से श्रद्धालुओं की सुविधाओं का ध्यान रखा जाता है। बता दें कि रिवालसर में बौद्ध धर्म के अलावा हिंदू और सिक्ख धर्मों के लोग भी बड़ी संख्या में रहते हैं। यहां लोमश ऋषि और सिक्खों के दसवें गुरू गोबिंद सिंह जी ने भी तपस्या की थी। यह इकलौता शहर है जहां तीनों धर्मों के लोग आपसी भाईचारे और सौहार्द के साथ रहते हैं।
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