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VIDEO: रास्ता न नाली और सरकारी योजनाओं से वंचित हैं ग्रामीण, पगदंडी व नाला पार कर पैदल आवागमन करना मजबूरी
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VIDEO: रास्ता न नाली और सरकारी योजनाओं से वंचित हैं ग्रामीण, पगदंडी व नाला पार कर पैदल आवागमन करना मजबूरी
डिजिटल इंडिया के बीच वीवीआईपी जिले का एक ऐसा गांव जो दशकों से अंधेरे में हैं। जिला मुख्यालय से मात्र सात किलोमीटर दूर गढ़ामाफी के पासिन का पुरवा गांव है। यहां दलित परिवार के 15 से अधिक परिवारों में करीब 100 से अधिक लोग रहते हैं। जो आज भी हर घर बिजली जैसी योजनाओं से दूर हैं। इस गांव में पहुंचने के लिए कोई रास्ता नहीं हैं। पगदंडी व बिजली खंभा के सहारे नाला पार कर करीब एक किलोमीटर से अधिक दूरी तय करना ग्रामीणों की मजबूरी है।
इसी तरह जिले में कई ऐसे गांव हैं जिन्होंने आज तक बिजली का दर्शन नहीं किया है। लोग अंधेरे में रहने को मजबूर हैं। करीब 100 से अधिक आबादी वाले इस पुरवे में शाम ढलते ही अंधेरा छा जाता है। गांव तक दो दशक पहले बिजली पोल लगाए गए, लेकिन बिजली के तार पहुंचे हैं और न ही घरों में एक भी बल्ब जल पाया है। ग्रामीणों ने जिला प्रशासन संग जन प्रतिनिधि से भी शिकायत की। लेकिन आज तक कुछ नहीं हो सका।
गांव में साइकिल के अलावा कुछ नहीं
बुधवार को गांव की पड़ताल की तो वहां पहुंचने के करीब एक किलोमीटर खेत और मेड़ के रास्ते नाला पार होकर जाना पड़ा। नाले पर रखा एक बिजली का खंभा जिस पर चलने से वह झोल खा रहा था। गांव में ज्यादा छप्पर, कच्चे घर व कुछ पक्के घर दिखे, तो लोगों ने अपनी मेहनत मजदूरी से तैयार किए हैं। उसी के नीचे सोना, खाना सब कुछ हैं। साइकिल के अलावा गांव में अन्य कोई साधन नहीं दिखा। कांति देवी ने बताया कि उनके ससुर 50 साल से यहां रह रहे हैं। वह 25 वर्षों से यहां रह रही हैं। न सड़क है न बिजली और न ही कोई योजना का लाभ मिला। राम मिलन ने बताया कि करीब 16 परिवार हैं। बारिश में जब चारों ओर पानी भर जाता है तो पलायन करने को मजबूर होना पड़ रहा है।
सुध लेने वाला कोई नहीं
रेखा, जीत कुमार, राजपति, विश्राम, राम मिलन, सुषमा देवी ने बताया कि चार दशक पहले यहां परिवार सहित हम लोग रह रहे हैं। बाढ़ आती है तो लोग दूसरे गांव में जाते हैं। जब बाढ़ आती है तो लोग रस्सी के सहारे नाला पार करने को मजबूर होते हैं। मांग के बावजूद नाले पर पुल नहीं बन सका। उजाले में खाना बनाना पड़ता है। कोई सुध लेने वाला नहीं है। सिर्फ वोट आने पर ही रास्ता बनवाने और बिजली देने का वादा किया जाता है। लेकिन आज तक कुछ नहीं हुआ। आज भी ढिबरी, लालटेन या मोबाइल की टॉर्च के सहारे रोशन होते हैं। मोबाइल चार्ज करने के लिए लंबा सफर डिजिटल युग में मोबाइल लोगों की जरूरत बन चुका है, लेकिन इस गांव के लोगों के लिए मोबाइल चार्ज करना भी बड़ी चुनौती है। ग्रामीणों को कई किलोमीटर दूर दूसरे गांव या कस्बे जाना पड़ता है। इससे समय और पैसे दोनों की बर्बादी होती है। ऑनलाइन पढ़ाई, डिजिटल भुगतान, बैंकिंग और सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में भी लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
पढ़ाई में आ रहा परेशानी
किशोरी रूपा ने बताया कि आठवीं तक पढ़ाई की है। आने जाने का रास्ता नहीं होने से पढ़ाई छोड़ दी। काजल ने बताया कि वह माधवपुर के पास एक इंटर कॉलेज में पढ़ाई करने जाती है। पगदंडी व नाले पर रखे बिजली खंभे को पार कर पढ़ने जाते हैं। बारिश होने पर आवागमन बंद हो जाता है और पढ़ाई बंद हो जाती है। रात में पढ़ाई नहीं होती है। परिजनों ने कई बार अधिकारियों से शिकायत के बाद भी गांव में बिजली के तार नहीं लगाए जा सके हैं।
बीमार होने पर सिर्फ चारपाई से ले जाना सहारा
रामाशीष ने बताया कि वह भी 25 साल से पहले वह मकान बनाकर रह रहे हैं। चकमार्ग निकला है लेकिन अतिक्रमण का शिकार हैं। अगर कोई बीमार होता है तो उसे चारपाई से एक किलोमीटर पैदल ले जाना पड़ता है। उसके बाद एंबुलेंस व साधन मिलता है उसके बाद अस्पताल पहुंचते हैं।
जांच कराकर सुविधाएं कराई जाएंगी मुहैया
सीडीओ पूजा साहू ने बताया कि संबंधित जिम्मेदारों को भेजकर जांच कराते हुए ग्रामीणों को सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी।
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