{"_id":"69b3ef0116941cf72d058957","slug":"video-eemaya-sanana-thayalja-vabhaga-asasatata-parafasara-da-rahana-akhatara-qisama-na-btaii-alvatha-jama-ka-ahamayata-2026-03-13","type":"video","status":"publish","title_hn":"एएमयू सुन्नी थियोलॉजी विभाग असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रेहान अख्तर क़ासमी ने बताई अलविदा जुमे की अहमियत","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
एएमयू सुन्नी थियोलॉजी विभाग असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रेहान अख्तर क़ासमी ने बताई अलविदा जुमे की अहमियत
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के सुन्नी थियोलॉजी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रेहान अख्तर क़ासमी ने अलविदा जुमे की अहमियत बताते हुए कहा कि रमजान का यह आखिरी जुमा मुसलमानों के लिए विशेष इबादत और आत्मचिंतन का दिन होता है। उन्होंने बताया कि जकात और सदका इस्लाम में जरूरतमंदों की मदद का अहम जरिया हैं और ईद‑उल‑फितर से पहले इन्हें अदा करना जरूरी माना गया है, ताकि गरीब और जरूरतमंद लोग भी ईद की खुशियों में शामिल हो सकें।
उन्होंने कहा कि जकात से समाज में बराबरी और सामाजिक न्याय की भावना मजबूत होती है। इसलिए हर सक्षम व्यक्ति को अपनी मालियत के अनुसार जकात और सदका अदा करना चाहिए।
अलविदा जुमे की नमाज के बाद लोगों ने देश-दुनिया में शांति, भाईचारे और खुशहाली के लिए दुआ की। मस्जिदों के आसपास प्रशासन की ओर से सुरक्षा और यातायात की विशेष व्यवस्था भी की गई थी, ताकि नमाजियों को किसी प्रकार की असुविधा न हो।
एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें
अमर उजाला प्रीमियम वीडियो सिर्फ सब्सक्राइबर्स के लिए उपलब्ध है
प्रीमियम वीडियो
सभी विशेष आलेख
फ्री इ-पेपर
सब्सक्राइब करें
Next Article
Disclaimer
हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।