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VIDEO : वाराणसी में कबीरा फेस्टिवल का समापन, गंगा घाट के किनारे पर बही सुरधारा, दर्शक हुए मुग्ध
कबीरा महोत्सव कार्यक्रम का समापन किया गया जिसमें फकीरा बैंड की प्रस्तुती में हर कोई खोकर रह गया। वाराणसी के घाटों पर आयोजित महिंद्रा कबीरा फेस्टिवल का आठवां संस्करण एक शानदार समापन प्रस्तुतियों के साथ संपन्न हुआ। तीन दिवसीय इस फेस्टिवल में संगीत, कला और दर्शन का एक अद्भुत संगम देखने को मिला।आज गुलेरिया कोठी में शांत और मधुर संगीत प्रदर्शन से हुई। प्रसिद्ध सितार वादक और सुरबहार वादक एस. मिश्रा, जो हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की बनारस घराना शैली में अपनी विशेषज्ञता के लिए जाने जाते हैं, ने दर्शकों का मनमोह लिया। कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित मिश्रा ने पारंपरिक बनारसी ठुमरी को कबीर के पदों की अपनी विशिष्ट व्याख्या के साथ अंतिम दिन के सुबह जोड़ा। उनके प्रस्तुति के बाद, मुंबई स्थित फ्यूजन बैंड मिथाविन ने भारतीय शास्त्रीय संगीत, जैज़ हारमोनी और लयबद्ध खांचे के एक अभिनव मिश्रण के माध्यम से कबीर के रहस्यवाद को जीवंत कर दिया। पंचगंगा हेरिटेज वॉक में आज भी यात्रा के माध्यम से दर्शकों को वाराणसी की समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का अनुभव लेना मौका मिलाहुआ, साथ ही मंदिर यात्रा में कई लोगों भव्य काशी विश्वनाथ के दर्शन किये। दोपहर के सत्र में दास्तान-ए-कबीर में हिमांशु बाजपेयी द्वारा आकर्षक कहानी और लोक कथाओं के माध्यम से कबीर के जीवन, दर्शन और कविता की खोज की गई। हिमांशु बाजपेयी ने अपनी मधुर आवाज में कबीर के बारे में कई रोचक अनसुनी बातें दास्तान के रूप में पस्तुति की। अगले सत्र में अरवानी आर्ट प्रोजेक्ट एक अनूठी पहल में ट्रांसजेंडर समुदाय को सशक्त बनाने और समावेशिता को बढ़ावा देने के लिए जोर दिया गया। कलात्मक अभिव्यक्ति को सामाजिक संवाद के साथ जोड़कर, यह पहल कबीर के समानता और एकता के आदर्शों का उदाहरण है। उत्सव के दो दिनों में, कलाकारों ने गंगा पर केंद्रित एक शानदार तीन-कैनवास कलाकृति बनाई, जिसका मुख्य संदेश था: यदि पानी हमारे बीच अंतर नहीं करता है, तो हम मनुष्य के रूप में ऐसा करने वाले कौन हैं? तैयार कलाकृति को शाम को शिवाला घाट पर प्रस्तुत किया गया। अंतिम दिन के शाम के कार्यक्रमों में शिवाला घाट पर फकीरा और थाईकुडम ब्रिज के संगीत और अनूठे मिश्रण के साथ 8 वे संस्करण को यादगार बनाते हुए सम्पन किया। फकीरा जो एक प्रसिद्ध ग्रुप है और बाउल और भटियाली जैसी बंगाली लोक परंपराओं को कबीर की आध्यात्मिक शिक्षाओं के साथ मिश्रित करता है। कबीर की कविता के साथ देहाती बंगाली ध्वनियों के बैंड के अनूठे मिश्रण ने दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया। इसके बाद थाईकुडम ब्रिज ने भारतीय लोक, शास्त्रीय और प्रगतिशील रॉक के अपने विशिष्ट मिश्रण से एक अविस्मरणीय समां बांधा। अपनी वैश्विक प्रशंसा और विद्युतीय प्रदर्शनों के लिए जाने जाने वाले इस बैंड ने महिंद्रा कबीरा फेस्टिवल को उसके शानदार समापन पर पहुंचाया
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