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अंबेडकरनगर में 65 साल की उम्र में भी चंद्रावती का नहीं टूटा हौंसला, हत्यारों के लिए मांगी मौत की सजा
अंबेडकरनगर में करीब 65 साल की उम्र, लड़खड़ाती जुबां और ढलता शरीर देख भले ही कोई चंद्रावती को कमजोर समझे, लेकिन इस उम्र में भी उनके साहस में कोई कमी नहीं है। जिस भतीजे मंशाराम को पाल-पोस कर बड़ा किया, उसकी हत्या के बाद सिर्फ चंद्रावती ही माफिया अजय सिपाही के सामने तनकर खड़ी रहीं। 10 साल तक चली इस कानूनी लड़ाई में फैसले के बाद भी चंद्रावती संतुष्ट नहीं हैं और हत्यारों के लिए मौत की सजा की मांग की कर रही हैं।
वर्ष 2016 में 23 मार्च को होली के पर्व के दिन चंद्रावती का बेटा समान भतीजा मंशाराम (28) को उनके पट्टीदार मुलायम व अजय यादव घर से लेकर निकले तो उनकी दुनिया ही उजड़ गई। मंशाराम के पिता जयजयराम मानसिक रूप से विक्षिप्त थे और मां मूकबधिर। ऐसे में मंशाराम व उनकी बहन मनभावती के भरण पोषण का जिम्मा चंद्रावती ने उठाया।
पहले बड़ी बहन मनभावती की शादी की, फिर घटना से करीब दो वर्ष पहले मंशाराम का विवाह सुनीता से कराया। वर्ष 2015 में पंचायत चुनाव के बाद मंशाराम ने महरुआ चौराहे पर पान की दुकान शुरू की थी। हंसता खेलता परिवार था। पत्नी को बच्चा न होने के कारण उसका इलाज भी कराया जा रहा था। हत्या के बाद मंशाराम की पत्नी सुनीता घर छोड़कर चली गई और कहीं दूसरी जगह शादी कर ली थी। हालांकि, परिवार रजिस्टर में नाम दर्ज होने जाने के कारण पैतृक संपत्ति सुनीता के नाम आ गई है और अब उस जमीन को वापस पाने के लिए भी चंद्रावती जंग लड़ रही हैं।
चंद्रावती अपने भतीजे मंशाराम को नरबलि बताती हैं। उन्होंने बताया कि अजय सिपाही का घर निर्माणाधीन था, जिसकी छत बार-बार गिर जा रही थी। घटना से पहले सात दिन से जाप कराया जा रहा था। किसी ने उससे कहा था कि जब किसी इकलौते पुत्र को बलि दोगे, तभी घर बन सकेगा। इसलिए अजय ने मुलायम व अजय यादव को दो-दो लाख रुपये देकर अपने घर बुलाकर मंशाराम की हत्या कर दी थी। हालांकि, इसकी कहीं पुष्टि नहीं हो पाई है।
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